Pages

Monday, May 11, 2020

जनस्वास्थ्य को समझें - एक सच्ची घटना के माध्यम से।

Originally Published on April 28, 2016 at: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2016/04/blog-post_28.html

जनस्वास्थ्य की परिभाषा: "जनस्वास्थ्य विज्ञान और कला का एक ऐसा संगम है जो संगठित प्रयासों एवं समाज, संगठनों, सार्वजनिक और निजी, समुदायों और व्यक्तियों के लिए उचित विकल्पों को ध्यान में रखते हुए बीमारी को रोकने और जीवन के समय को बढ़ाने की दिशा में काम करता है। सरल भाषा में यदि इसे समझें तो जनस्वास्थ्य व्यक्तियों एवं जनसमूहों को घोर बिमारियों से बचाने कि दिशा में काम करता है। जनस्वास्थ्य की क्रिया-कलापों का क्रियान्वयन स्थानीय परिथितियों, जन-भावनाओं को ध्यान में रख कर किया जाता है। चूँकि यह सदियों से चले आ रहे रीतियों एवं जीवन जीने की शैली को बदलने की दिशा में काम करता है, इसमें जन-संवाद की एक बहुत ही बड़ी भूमिका होती है। अंतिम पंक्तियों में स्थानीय परिस्थितियां, जन-भावना, सामाजिक रीतियों आदि के बारे में बताया गया है। ये घटना इन्ही मुद्दों को समझाने एवं सही कदम उठाने को लेकर है। 

घटना २००६ की है; स्थान - गुजरात का एक आदिवासी जिला। ये जिला गुजरात राज्य के मानकों के अनुसार निचले पायदानों पर था। पर २००६ में एक नए मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकार (Chief District Health Officer - CDHO) और जिला कार्यक्रम प्रबंधक (District Programme Coordinator - DPC) की नियुक्ति हुई थी और इस जोड़ी ने कुछ अच्छे प्रयास किये जो सराहे भी गए। परन्तु पिछड़ा जिला होने के कारण अभी भी बहुत कुछ करना बाकी था। 

ये घटना जुड़ी है पल्स-पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम से - अमिताभ बच्चन जी ने इसके लिए "दो बून्द जिंदगी की" नामक अभियान का नेतृत्व किया था। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा के दौरान अधिकारियों ने ये बात स्वीकार किया कि पिछले साल की तुलना में इस साल प्रगति बेहतर हुई है। परन्तु उसी मीटिंग में CDHO ने ये बात उठाई के एक ब्लॉक है जिसके आंकड़े तदनुरूप प्रगति की तरफ इशारा नहीं करते। संख्याओं का गाँवो के अनुसार विश्लेषण एवं स्थानीय ब्लॉक अधिकारियों से बात करके पता चला कि कुछ गाँव हैं जहाँ पर पोलियो टीकाकरण की प्रगति नगण्य है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ होने के कारण DPC को इसके तह में जाने का आदेश दिया गया और साथ ही यह भी कहा गया कि इसका समाधान ढूँढा जाय। 

काफी अनुसन्धान करने के बाद DPC और उनके दल ने अपना ध्यान २-३ गाँवो पर केंद्रित किया। ये गाँव ब्लॉक को जनपद मुख्यालय से जोड़ने वाली मुख्य सड़क से करीब ४० किमी की दूरी पर बसे हैं; परन्तु अगम्य क्षेत्र होने के कारण यहाँ पहुँचने में करीब ३ घंटे लगते हैं। इन गाँवो में एक विशेष संप्रदाय के लोग रहते हैं, इनके नाम, रहन-सहन, खाना, सब कुछ एक आम आदिवासी गुजराती जैसे ही हैं परन्तु ये लोग अपने आप को एक अलग देश का मानते हैं। इनका अपना एक अलग झंडा भी है। सम्प्रदाय के प्रमुख को ये "मालिक" के नाम से बुलाते हैं और ये अपने मालिक के कहने पर कुछ भी कर सकते हैं। इनके मालिक के शब्द इनके लिए भगवान के शब्द जैसे हैं। बाहर के लोगों को ये हमेशा संदेह की दृष्टि से देखते हैं और उनका प्रवेश लगभग वर्जित है। क्षेत्र दुर्गम होने के कारण सड़कें उतनी अच्छी नहीं हैं परन्तु गुजरात सरकार ने बिजली की व्यस्था अवश्य की है - मजेदार बात ये है कि ये अपने को एक अलग देश मानने के बाद भी बहुत सारी सरकारी सुविधाओं का उपयोग करते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात - इन गाँवों में इस विशेष सम्प्रदाय के अतिरिक्त भी कुछ और परिवार रहते हैं पर इनकी संख्या १०% से भी कम होगी। 

इन सारे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए CDHO ने ये निश्चित किया कि DPC और २ और लोगों का एक छोटा दल इस गाँव में टीवी रिपोर्टर बन कर जायेंगे (इससे गाँव में प्रवेश आसान हो जाता) और अभिवावकों द्वारा अपने बच्चों को पोलियो का ड्राप ना पिलाने के कारणों का पता लगाएंगे। करीब १८० बच्चों को पोलियो की खुराक दी जानी थे जिसमे से केवल सरपंच ने अपने बच्चों को पिलवाई थी। टीम ने सरपंच और कुछ और प्रमुख लोगों से बात की; पोलियो के विरोध के कुछ मुख्य कारणों को मैं यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ:

  • पोलियो की दवाई विदेशी कम्पनी ने बनायीं है, ये बन्दर की किडनी से बनायीं जाती है और इसे एड्स होने का खतरा है।  बच्चे नपुंसक भी हो सकते हैं - एक दुकानदार (भ्रान्ति/गलत धारणा/misinformation)
  • जब तक हमारे "मालिक" नहीं कहेंगे हम कोई भी दवा नहीं लेंगे - एक गाँववाला (अन्धविश्वास)
  • दूसरे गाँववाले को ये बताने पर कि पोलियो खुराक ना देने से बच्चे में अपंगता आ सकती है - अगर हमारे बच्चे मर गए तो इससे सरकार को क्या? (यथा स्थिति बनाये रखने की हठधर्मिता)
  • हमने कभी पोलियो खुराक नहीं ली और हमें कुछ नहीं हुआ तो हमारे बच्चों को भी कुछ नहीं होगा - एक महिला (पुरानी रीतियाँ/जीवन शैली को न बदलने की जिद)
  • कुछ महिलाओं (१-२) ने ये भी कहा कि यदि वो अपने बच्चों को पोलियो की खुराक दिलाना भी चाहें तो भी नहीं कर सकती, क्योंकि निर्णय लेने का अधिकार केवल पुरुषों के पास है (महिला सशक्तिकरण की कमी)
यदि आप इन कारणों को देखें तो हर एक कारण को जनस्वास्थ्य से सम्बंधित मुद्दों से जोड़ा जा सकता है। और जैसा कि मैंने पहले लेख में कहा था - इन कारणों का निदान करने के लिए चिकित्सीय देखभाल कि नहीं वरन सही संसूचनाओं, परामर्श, पक्षसमर्थन/एडवोकेसी (इस समुदाय के मुखिया एवं प्रबुद्ध जनों के साथ) की आवश्यकता है। और इसके बाद भी हो सकता है कि बहुत कम लोग ही पोलियो की खुराक दिलाने के लिए तैयार हों। जनस्वास्थ्य के क्रियाकलापों के क्रियान्वयन में इसलिए समय लगता है और ये सबसे बड़ा अंतर है अस्पतालों में बिमारियों के निदान एवं जनस्वास्थ्य की गतिविधियों में। 

अब इस कहानी को समाप्त करने का समय है पर उससे पहले मै ये तो बता दूँ कि DPC और उनके छोटे से दल ने क्या गुल खिलाये :) 
  • दल ने गाँव वालों को ये नहीं पता चलने दिया कि वो स्वास्थ्य विभाग से हैं। २ दिन गाँव में रुके और लोगों से संवाद करने का प्रयास किया। हर विषय पर बहस हुई, और दल ने तर्कसंगत बातों से उन्हें मनाने का प्रयास किया।  
  • टीम ने गाँव में देखा कि स्वच्छता का आभाव है और काफी लोग चोट लगने, बुखार, और कुछ और छोटी-२ परेशानियों से ग्रसित हैं परन्तु फिर भी दवा नहीं ले रहे। दूसरे दिन तक टीम ने सरपंच और कुछ और लोगों को विश्वास में लेकर एक स्थानीय NGO को मेडिकल कैंप लगाने के लिए बुलाया। इस छोटे प्रयास के बाद गाँव के कुछ और लोग भी टीम के समर्थन में आये। 
  • तीसरे दिन तक प्रयास यहाँ तक पहुँच गया कि गाँव के कुछ लोग सामने आ कर बोले कि सरकारी ANM / डॉक्टर को पोलियो की खुराक लेकर बुलाया जाय, जो लेना चाहेंगे वो लेंगे और जो नहीं चाहेंगे वो नहीं लेंगे। 
  • उस दिन १८० में से करीब २६ बच्चों ने खुराक ली - ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। 
  • पूरे गाँव को मनाने में १-२ साल लग गए पर प्रयास यहीं से शुरू हो गया; और हाँ, जाने से पहले टीवी रिपोर्टर वाला सच गाँव वालों के सामने रखा गया।
जनस्वास्थ्य के कार्यक्रम काफी विस्तृत व् बृहद होते हैं, ये छोटी घटना केवल उदाहरण के रूप में दी गयी गयी है। और जाते-जाते ये कहना चाहूंगा कि मै इस बात की पुष्टि या खंडन नहीं कर सकता कि मैं इस घटनाक्रम का हिस्सा था या नहीं। अपने विचारों से अवगत कराइयेगा। 

आयुष्मान भव ! Changing Landscape of Healthcare Delivery in India

Originally Published on July 30, 2018 at: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2018/07/changing-landscape-of-healthcare.html

अपने देश में स्वास्थ्य क्षेत्र की कहानी थोड़ी मजेदार है। जहाँ केंद्र सरकार का काम नीति निर्धारण है तो राज्य सरकारों का काम क्रियान्वयन है। परन्तु अधिकतर यह देखा गया है कि केंद्र और राज्य सरकार एक दूसरे के लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल का उल्लंघन करते रहते हैं। किसी भी देश के स्वास्थ्य क्षेत्र पर ध्यान को इस बात से मापा जाता है कि वो अपने सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। भारत ने अपना लक्ष्य २.५% रखा है, परन्तु वर्तमान में यह केवल १.१५% ही है। इसका अर्थ यह नहीं की सब कुछ गड़बड़ ही है, अगर बजट की तुलना की जाये तो पिछले ३ साल में ही स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट रु. ३८,९९५ करोड़ से बढ़ कर रु. ५४,६०० करोड़ हो गया है, यानी कि ४०% की वृद्धि। इस वृद्धि का प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद के सापेक्ष्य प्रतिशत पर इसलिए नहीं पड़ा क्योंकि इस अवधि में सकल घरेलू उत्पाद में भी बढ़ोत्तरी हुई है।

पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य क्षेत्र के आंकड़ों में भी जबरदस्त सुधार आया है - माता मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में भरी गिरावट आयी है। लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। आपको यह जान कर शायद आश्चर्य ना हो कि भारत की जनता लगभग ७०% स्वास्थ्य सेवायें निजी क्षेत्र से लेती हैं और इसका असर उनके आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है। एक सुदृढ़ बीमा व्यवस्था के आभाव में बीमारी का लगभग ६०-७०% खर्चा जनता को स्वयं वहन करना पड़ता है; अलग-अलग स्रोतों से यह सिद्ध हुआ है कि इस व्यस्था से करीब २-३ करोड़ लोग हर वर्ष गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। यह एक बहुत ही दुखद स्थिति है और इससे निपटने की रणनीति होना आवश्यक है।

इस परिस्थिति से लड़ने के लिए २००८ में भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना प्रारम्भ की। इस योजना के अंतर्गत गरीब परिवारों को चिकित्सा के दौरान आर्थिक लाभ देने का प्रावधान किया गया। इस सुविधा का लाभ इम्पैनल किये गए सरकारी एवं निजी क्षेत्र के अस्पतालों में लिया जा सकता है। करीब २५ राज्यों ने इस योजना को अपनाया और करीब ३ करोड़ से ज्यादा परिवार इसके अंदर सम्मिलित किये गए। इस योजना का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि ऐसे जगहों में स्वास्थ्य सुविधायें मिलने लगी, जहाँ पहले नहीं थीं। लेकिन इस योजना में एक ही कमी थी कि प्रत्येक लाभार्थी परिवार, एक साल में कुल रु. ३०,००० तक का ही लाभ ले सकता है। इससे बड़ी बिमारियों के कारण होने वाले आर्थिक व्यय से लाभ नहीं मिल पाया।

इसी विषय को हल करने के लिए, भारत सरकार ने "आयुष्मान भारत - राष्ट्रिय स्वास्थ्य सुरक्षा मिशन" की घोषणा की। यह मिशन अलग-अलग बिखरी हुई स्वास्थ्य व्यस्थाओं को एक साथ ला कर, एक सम्मिलित प्रयास के माध्यम से सही परिणाम लाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यह न केवल दक्षता को बढ़ाएगा बल्कि अस्पताल में होने वाली अधिकांश लागतों के लिए वित्तीय स्वास्थ्य संरक्षण भी प्रदान करेगा, जिससे चिकित्सा में होने वाले स्वयं के खर्च में कमी आएगी। इस मिशन के अंतर्गत प्रति लाभार्थी परिवार रु. ५ लाख का बीमा कवर मिलेगा और करीब ११ करोड़ गरीब परिवारों को यह लाभ मिल पायेगा। जब यह योजना पूरी तरह से लागू होगी, तब यह विश्व की सबसे बढ़ी सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य बीमा योजना होगी। इस मिशन के दो प्रमुख उद्देश्य हैं - (i) गरीब परिवारों के लिए वित्तीय सुरक्षा को बढ़ाना, एवं (ii) इन परिवारों को गुणवत्ता भरी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना।

यह योजना स्वास्थ्य क्षेत्र की दक्षता एवं परिणामों में सुधार के लिए, सरकारी एवं निजी क्षेत्र से अस्पताल में भर्ती हो कर इलाज कराने की सेवाओं की सामरिक खरीद के माध्यम से काम करती है। यह योजना राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच एक निर्धारित किये गए अनुपात के आधार पर वित्तीय सहभागिता पर कार्य करेगी और क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व दोनों के ऊपर होगा। वर्तमान में करीब २५ राज्य इस योजना से जुड़ चुके हैं, आईटी प्लेटफार्म लगभग बन कर तैयार हो चुके हैं, राज्यों का प्रशिक्षण किया जा रहा है और इससे जुड़ी टीम लगभग १०-१२ घंटे रोज (शनिवार और रविवार को भी) काम कर रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह योजना आगे चल कर भारत के जान स्वास्थ्य के इतिहास का मील का पत्थर साबित होगी।



जाते जाते एक बात आप सबसे साझा करना चाहूंगा। हम सबके मन में यह कौतूहल होगा कि आखिर अच्छे स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है?  विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHOके अनुसार:

"Health is a state of complete physical, mental and social well-being and not merely the absence of disease or infirmity" 

OR 

"स्वास्थ्य शारीरिकमानसिक और सामाजिक रूप पूर्णतः स्वस्थ होना है और ना कि शरीर में केवल रोग या दुर्बलता का अभाव"

इस परिभाषा पर भी अभी तक एकमत नहीं है और मूल विवाद इसमें प्रयोग किये गए शब्द "पूर्ण" को लेकर है। विद्वानों का मानना है कि "पूर्ण" को परिभाषित एवं सीमांकित करना संभव नहीं है। इस विवाद पर एक लेख आपको यहाँ मिल जाएगा - Sport, Disability and an Original Definition of Health. परन्तु आज के समय में अधिकांश रूप में यही परिभाषा प्रयोग में लायी जाती है।  आयुर्वेद में स्वास्थ्य को निम्न रूप में परिभाषित किया गया है (स्रोत: Wikipedia): 

समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थः इत्यभिधीयते ॥
(जिस व्यक्ति के दोष (वात, कफ और पित्त) समान हों, अग्नि सम हो, सात धातुयें भी सम हों, तथा मल भी सम हो, शरीर की सभी क्रियायें समान क्रिया करें, इसके अलावा मन, सभी इंद्रियाँ तथा आत्मा प्रसन्न हो, वह मनुस्य स्वस्थ कहलाता है )। यहाँ 'सम' का अर्थ 'संतुलित' (न बहुत अधिक न बहुत कम) है।

मुझे स्वास्थ्य की यह परिभाषा एकदम सटीक लगती है। आशा है कि आयुष्मान भारत योजना, इस परिभाषा के अनुरूप कार्य कर पाएगी। 

आयुष्मान भव   !!  जय हिन्द  !!

समस्याओं का चिन्हीकरण (issue mapping) एवं व्यवहार परिवर्तन (behavior change)

Originally published at: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2020/04/issue-mapping-behavior-change.html

आज कल एक नया शगूफ़ा आया है बाज़ार में - ह्यूमन सेंटर्ड डिजाइन (Human Centered Design or HCD). अब क्या है ये HCD? आइये देखते हैं कि विकिपीडिया ने HCD की क्या परिभाषा बताई है:

"HCD is an approach to problem-solving, commonly used in design and management frameworks that develops solutions to problems by involving the human perspective in all steps of the problem-solving process. Human involvement typically takes place in observing the problem within context, brainstorming, conceptualizing, developing, and implementing the solution."

इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी भी समस्या का समाधान ढूंढने के लिये, उस समस्या से प्रभावित लोगों के बीच जाइये और उनके साथ मिलकर विभिन्न समस्याओं को चिन्हीकरण करिये, उसके समाधान के ऊपर चर्चा करिये, समाधान की रूप रेखा तैयार करिये और फिर समाधान को कार्यान्वित करिये। 

और सीधी भाषा में बात करें तो अब विशेषज्ञ लोग अपना दिमाग नहीं लगायेंगे और आपको ही आपकी समस्या का समाधान ढूंढने के लिये कहेंगे। अब यह बात यहाँ मैंने मज़ाक में कही है परन्तु यह एक गंभीर बात है। इतने वर्षों बाद ही सही पर बुद्धिजीवी वर्ग को यह समझ में आ रहा है कि जिसकी समस्या है उसकी भागीदारी समस्या निवारण के नियोजन एवं क्रियान्वयन में भी होनी चाहिये। 

अब बात करते हैं कि HCD का प्रयोग व्यवहार परिवर्तन के लिए कैसे कर सकते हैं और मुख्यतः COVID-19 के विषय में इसकी क्या भूमिका है। 

एक कहानी, शायद बहुत घरों में हुई होगी या सुनी होगी, कि कैसे घर के बड़े जब छोटे बच्चे ढिबरी/दिया के पास हाथ ले जाने से नहीं मानते थे तब वो एक बार बच्चे के ऊँगली जलते दिए में लगा देते थे और बच्चे उसके बाद सब समझ जाते थे। अब ये उस समय का HCD था जिसमे जिसकी समस्या है उसे समस्या से रूबरू करा दो हमेशा के लिए व्यवहार परिवर्तन हो जाएगा। यही हाल अब COVID-19 का हो गया है। हमारी ऊँगली ढिबरी की लौ में लग गयी है और हमें जलन महसूस हो रही है और अब हमें व्यवहार परिवर्तन करना ही पड़ेगा।  पर कैसे?

चलिये पहले विभिन्न समस्याओं का चिन्हीकरण करते हैं:
  • विषाणु (वायरस) घर के अंदर कहाँ-कहाँ से आ सकता है? - कोई बाहर से घर के अंदर आये, बाहर का कोई सामान घर के अंदर आये आदि। 
  • विषाणु घर के अंदर कहाँ-कहाँ रह सकता है? - घर के दरवाजों के हैंडल पर, बिस्तर पर, बाहर से आये सामान पर आदि। 
  • विषाणु शरीर के अंदर कैसे प्रवेश कर सकता है? - विषाणु केवल आँख, मुँह और नाक के रास्ते शरीर में अंदर जा सकता है और ये मुख्यतः दो ही तरीके से हो सकता है - (i) कोई संक्रमित व्यक्ति आपके पास में हो और छींके या खाँसे या (ii) आपके हाथ किसी संक्रमित सतह को छूये हों और वही हाथ आँख, नाक या मुँह में लगे। 
अब इन समस्याओं को दूर कैसे कर सकते हैं?

१-विषाणु को घर के अंदर आने से रोकना - 
  • कोई भी व्यक्ति बाहर से आने पर घर के दरवाजे पर हाथ न लगाये, घर के अंदर का ही व्यक्ति ही दरवाजा खोले। यदि घर में कोई नहीं है तो चाभी से दरवाजा खोलने के बाद सीधे पहले अपने हाथ साफ़ करें और दरवाजे के हर हिस्से को साफ़ करें जो आपने छूआ हो।  प्रयास करें कि, यदि संभव हो तो, दरवाजे के एकदम पास में ही अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइजर रखा हो ताकि आप घर के बहुत अंदर जाये बिना ये सफाई का काम कर सकें। 
  • बहार से जो व्यक्ति आ रहा है, चाहे वो परिवार का व्यक्ति हो या घर में काम करने वाला, सबसे पहले उस व्यक्ति का हाथ साफ़ करायें इससे पहले कि वो व्यक्ति घर का कोई भी सामान छूये। 
  • बाहर से जो सामान आया है उसे एक किनारे रखें और सफाई का पालन करें। अधिक जानकारी आपको इस पोस्ट में मिल जायेगी। 
  • प्रयास करिये कि घर के बिस्तर तक तभी कोई जाय जब वो अपनी सफाई कर चुका हो। 
  • घर के दरवाजे, उसके हैंडल्स, बिस्तर इत्यादि की सफाई करते रहिये। 
२-विषाणु को शरीर के अंदर प्रवेश करने से रोकना -
  • जैसा कि आपने मेरे पिछले एक पोस्ट में पढ़ा, हर व्यक्ति दिन भर में हजारों बार अपने हाथ से अपने मुँह और इसके विभिन्न हिस्सों को छूता है।  अब इसे जितना कम कर सकें हमें करना चाहिये। पर पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है इसलिये हाथ की स्वच्छता रखना ही एक सही समाधान है। 
  • आपको लगेगा की शायद में अति कर रहा हूँ पर दिन में जितनी बार हाथ धो सकते हैं धोते रहिये। जब भी आपको लगे कि आपने कोई ऐसी वस्तु या सतह छुई है जो कि संक्रमित हो सकती है, उसी समय हाथ साफ़ करिये। 
  • अब जबकि संक्रमण चारो तरफ फैल चुका है, प्रयास करिये कि जब भी घर से बाहर निकलें अपने चेहरे को ढँक कर रखें। 
अब बहुत से लोग ये बोल सकते हैं कि गाँव में या गरीब लोगों के यहाँ इतनी सारी साफ-सफाई संभव नहीं है। तो मेरा एक साधारण सा सवाल है - अपना हाथ तो साफ़ रख ही सकते हैं और चेहरा ढँक कर? इसीलिये मैंने पहले भी बोला कि जिसके जैसे संसाधन हैं उन्ही से पूछिये कि "इतने तरीके से यह विषाणु आपके अंदर प्रवेश कर सकता है, आप इसे अपने सीमित सन्साधनों के साथ कैसे रोकेंगे?" इतना ही है HCD, हम वो समाधान ना बतायें जो हमें सही लगे, हम सीधे जनता से ही पूछें कि "यदि समस्या X है तो उसका समाधान क्या होगा? और अगर समाधान Y होगा तो आप अपने संसाधनों के साथ इसे कैसे करेंगे?"

हम सभी को स्वयं में परिवर्तन तो लाना ही है पर HCD विशेषज्ञ बन कर अपने आस-पास के लोगों से समस्या का चिन्हीकरण करवाना है और समाधान ढुँढ़वाना है। 

एक गृह-कार्य करेंगे आप? अपने घर से ही शुरू करिये। बिना उत्तर बताये आप ऊपर लिखे सवाल करिये और पूछिये कि विषाणु कैसे और कहाँ-कहाँ से घर और शरीर के अंदर आयेगा और हम उसे कैसे रोक सकते हैं। व्यवस्था परिवर्तन में सरकारें केवल भागीदार हो सकती हैं सम्पूर्ण कर्ता-धर्ता नहीं। हमें और आपको मिल कर अपनी छोटी जिम्मेदारी निभानी है और लोगों को व्यवहार परिवर्तन के लिये प्रेरित करना है। 


जय हिन्द........ !!

Corona वायरस की लड़ाई अज्ञान और गलत ज्ञान के साथ भी है - #FightAgainstCorona

Originally published at: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2020/04/fightagainstcorona.html

पिछले २ पोस्ट में आपने पढ़ा की COVID-१९ क्या है और इससे बचने के लिए क्या करें। इस पोस्ट में मैं कुछ भ्रांतियों और बचाव के तरीकों के ऊपर चर्चा करूँगा।

घर में प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को कैसे साफ़ रखें?
आजकल के समय में जब सारा ध्यान whatsapp और tik-tok के माध्यम से प्रचारित किये जा रहे सन्देशों पर रहता है तो  ये पता करना कठिन है कि क्या सही है और क्या गलत। डरने से पहले एक बात जान लीजिये कि ये वायरस आपके खिड़की के रास्ते या पार्क में घूमने से आपको संक्रमित नहीं कर पायेगा। बचाव आवश्यक है पर अनावश्यक डर खतरनाक है। उदाहरण स्वरुप - अधिकतर लोग बोल रहे हैं कि यदि हम नोट या कागज़ या चिट्ठी आदि छुयेंगे तो हमें भी संक्रमण का खतरा हो सकता है। अब आपका डर गलत नहीं है पर इस तरह आप डर जायेंगे तो जीवन कैसे चलेगा। डर के साथ हमें सही तरीके का ज्ञान होना चाहिए जिससे हम संक्रमित होने से बच सकें।

अब नोट या कागज़ की ही बात करते हैं - यदि आपको डर है कि आपने किसी संक्रमित वस्तु को छुआ है तो अपने चेहरे पर हाथ लगाने से पहले अपने हाथ को साबुन-पानी से या santizer से साफ़ अवश्य करें। अब जैसा कि मैंने अपने पहले पोस्ट में बताया था, हम दिन भर में २०००-३००० बार अपने चेहरे को छूते हैं, हमें इस व्यवहार में कमी लानी होगी।

एक और डर है लोगों के मन में की बाजार से आने वाली सब्ज़ियों और फलों को कैसे धोयें और साफ करें। पहला, जैसे ही आप बाजार से घर पहुँचते हैं, सब्ज़ियों को किसी समतल जगह पर रख दीजिये जहाँ पानी से धोने की व्यवस्था हो। पहले अपने हाथों को साबुन से धोइये और फिर सब्ज़ियों और फलों को। साबुन या सोडा से धोने की कोई आवश्यकता नहीं। सब्जी पूरी तरह से पका कर ही खाइये। चूँकि फलों को पका नहीं सकते इसलिए उन्हें करीब २-३ दिन तक ऐसे ही रखिये और फिर खाइये। सब्ज़ियों को धोने के बाद अपने हाथों को फिर एक बार साबुन से धोयें।

कई लोग ये प्रश्न उठाते हैं कि किराने के सामानों को तो नहीं धो सकते, उनका क्या करें? प्रश्न सही है और हमें इसका जवाब भी ढूंढना होगा। चूँकि किराने के सामानों को नहीं धुल सकते इसलिये एक बेहतर तरीका यह है कि इन सामानों को २-३ दिन के लिये ऐसे ही रखिये और फिर इनका प्रयोग करिये। इन सामानों को छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को अवश्य धोयें। अक्सर हम किराने के सामान सुपर-मार्किट से खरीद कर लाते हैं। प्रयास करिये कि आप एक sanitizer अपने साथ अवश्य रखें। सामान ट्राली के हैंडल को भी sanitize करें और अपने हाथों को भी sanitize करते रहें।

एक और वस्तु जो हमें  साफ रखनी है वो हैं हमारे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स - फ़ोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, कोई अन्य गैजेट आदि। स्प्रे sanitizer अगर है तो उसका प्रयोग करें नहीं तो टिश्यू पेपर को अल्कोहल बेस्ड sanitizer से गीला करके साफ़ करें। यह अपनी आदत में डाल लीजिये - बहुत फायदे मिलेंगे।

कुछ और मुद्दों पर बात करते हैं:
एक भ्रान्ति है लोगों के मन में कि यदि वो धूप में रहेंगे तो उनको संक्रमण नहीं होगा और गर्मी बढ़ने से coronavirsu अपने आप ख़त्म हो जायेगा। तो आपको ये जान कर आश्चर्य होगा कि गर्म देशों में भी इस वायरस का संक्रमण फैला है और अभी तक कहीं सिद्ध नहीं हुआ है कि गर्मी होने से यह वायरस ख़त्म हो जायेगा।

अब एक दिन कोई मुझे बोल रहा था कि अगर आप १० सेकंड तक बिना खाँसे अपनी साँस रोक सकते हैं तो आपको Corona वायरस का संक्रमण नहीं होगा। ऐसा कुछ नहीं है। आप संक्रमित हैं या नहीं ये केवल लैब टेस्ट से ही पता चल सकता है, इसका कोई और तरीका नहीं है।

सबसे मजेदार चर्चा तो यह चल रही है कि शराब पीने से आपको Corona वायरस का संक्रमण नहीं होगा। इस भ्रान्ति का सबसे बड़ा कारण यह है कि सबको यह लगता है कि अल्कोहल बेस्ड sanitizer लगाने से चूँकि वायरस समाप्त हो जाता है तो शराब पीने से शरीर के अंदर का भी वायरस ख़त्म हो जायेगा। ये सरासर गलत है और इसके ऊपर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।

अब बहुत सारे लोगों को ऐसा लगता है कि मच्छर के काटने से Corona वायरस का संक्रमण फ़ैल सकता है। एक बात मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि अभी तक ऐसा कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ है। जो प्रमुख बात है वो यह है कि आपको अपनी सफाई रखनी है और चेहरे को नहीं छूना है।

एक और मजेदार बात - कुछ दिनों पहले हमारी हाउसिंग सोसाइटी में थर्मल स्कैनिंग शुरू हुई। अपने देखा होगा कि आजकल लगभग हर जगह यह स्कैनिंग हो रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि COVID-१९ के लक्षण कई बार ८-१० दिनों तक भी दिखायी नहीं देते और इसलिये ये आवश्यक नहीं है कि थर्मल स्कैनिंग से "बिना लक्षण वाले" संक्रमण की पहचान हो पायेगी।

अब अंतिम बात कह कर ये पोस्ट समाप्त करूँगा - कई लोगों को ये लगता है कि एंटीबायोटिक्स खाने से इस वायरस का संक्रमण रुक जायेगा। यहाँ तक कि कुछ डॉक्टर भी ऐसी बात कर रहे हैं। यह बात आप ध्यान में रखिये कि एंटीबायोटिक्स वायरस के विरुद्ध काम नहीं करता और इसलिये अगर आपको COVID-१९ के लक्षण हैं तो स्वउपचार में एंटीबायोटिक्स मत खाना प्ररम्भ कर दीजिये। हाँ, अस्पताल में कई बार COVID-१९ के बीमार को एंटीबायोटिक्स देते हैं पर वो इसलिए क्योंकि कुछ मरीजों में COVID-१९ के साथ-२ बैक्टीरिया जनित संक्रमण भी हो सकता है।

सबसे प्रमुख बात यह है कि वायरस अगर आपके हाथ में लग भी गया है तो वह तब तक आपके शरीर में नहीं घुसेगा जब तक आप अपने संक्रमित हाथों से अपने चेहरे को छू कर  उसे अंदर आने का निमंत्रण नहीं देते। इसलिये आवश्यक है कि जितनी बार हो सके अपने हाथों को साफ़ करते रहें और संक्रमण होने की सम्भावना वाले लोगों से दूरी बनाये रखें। 

आशा है इस से थोड़ी और जानकारी आप सब तक पहुँच पायी हो। सुरक्षित रहिये - दूरी बनाये रहिये। 

बंद हैं हदों में ताकि जड़ें मज़बूत रहें - Fight Against COVID-19!

Originally published at: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2020/04/fight-against-covid-19.html

२४ मार्च २०२० को प्रधान मंत्री जी ने ये घोषणा की कि १४ अप्रैल २०२० तक देश भर में लॉक डाउन या ताला बंद रहेगा । स्वतंत्र भारत के इतिहास में संभवतः पहली बार हुआ है कि पूरा देश एक झटके में रोक दिया गया है। इस बात का अंदेशा मुझे पहले से ही था क्योंकि जबसे ये महामारी फैली है तबसे हमारी संस्था के अधिकतर लोग इस समस्या से लड़ने के लिये केंद्र और राज्य सरकारों की मदद में लगे हुये हैं और इसलिये कुछ बातें छन-छन कर हमारे पास भी पहुँचती रहती हैं।

पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा की Corona वायरस और इससे होने वाली बीमारी के बारे में। आज मैं इस महामारी से बचाव में किये जा रहे कामों का उल्लेख करूँगा। एक जन-स्वास्थ्य के बहुत बड़े शोधकर्ता और विशेषज्ञ हैं, डॉ टॉम फ्रिएडेन, उनकी मानें तो (और अभी तक डेटा भी यही कहता है) यह वायरस अधिक उम्र और पहले से किसी बीमारी से ग्रसित लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इस स्तर का प्रभाव इससे १०० साल पहले आये महामारी में ही देखा गया था। एक दूसरी प्रमुख बात यह है कि बच्चों को यह वायरस बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पा रहा है (अभी तक)।

COVID-19 से लड़ने के मुख्य तरीके हैं:

  1. बीमारी को नियंत्रित करना - यह महामारी का पता चलते ही शुरू हो जाना चाहिये। इसमें प्रमुख हैं - (i) संदिग्ध लोगों की जाँच करना, (ii) संदिग्ध लोगों को आम जनता से अलग रखना, (iii) अस्पतालों को सुदृढ़ बनाना और वहां काम कर रहे लोगों को सुरक्षित रखना, और (iv) उपचार से सम्बंधित संसाधनों को समय पर उपलब्ध कराना। 
  1. बीमार लोगों से संपर्क में आये हुये लोगों के बारे में पता करना एवं उनको घेर (contain) कर के रखना ताकी बीमारी समुदाय में बाकी लोगों को ना फैले। वैसे भारत जैसे देश में ये इतना आसान नहीं है। 
  1. लोगों में सफाई और अपने-आप को घर में रहने के लिये व्यवहार में परिवर्तन पर ध्यान देना। ये चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसे समाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन के दायरे में गिना जाना चाहिये। 
  1. अगर महामारी और भी विस्तृत रूप ले लेती है तो स्वयं में व्यवहार परिवर्तन काम में नहीं आता और फिर सरकारों को लॉक-डाउन जैसे कड़े कदम भी उठाने पड़ते हैं।     
अब अगर लॉक-डाउन की बात करें तो ऐसा नहीं है कि ये अपने आप में एक सम्पूर्ण समाधान है और इसको लम्बे समय तक रखने से महामारी की समस्या दूर हो जायेगी। लॉक-डाउन के २ मुख्य उद्देश्य होते हैं - (i) महामारी के त्वरित फैलाव को धीमा करना, और (ii) स्वास्थ्य व्यवस्था को थोड़ा और समय प्रदान करना ताकि वो इस महामारी से लड़ने के लिये फिर से एक बार तैयार हो सके। डॉ टॉम फ्रिएडेन इस विषय पर भी अपना मत रखते हुये कहते हैं कि लॉक-डाउन की व्यवस्था थोड़े-थोड़े अंतराल पर खुलती-बंद होती रहनी चाहिये। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कोई भी देश लम्बे समय तक लॉक-डाउन सहन नहीं कर सकता और उसकी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है। 

लेकिन लॉक-डाउन हटाते समय भी कुछ प्रमुख बातों का ध्यान रखना चाहिये - (i) संक्रमण पहले जैसी तेजी से न फ़ैल रहा हो और लगभग हर पॉजिटिव केस के बारे में हमें पूरी जानकारी हो, (ii) चिकित्सा-स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तयारी में हो कि अगर संक्रमण बढ़े तो उससे लड़ सके, और (iii) जन-स्वास्थ्य व्यवस्था परिक्षण, पॉजिटिव लोगों के संपर्क में आये हुये लोगों के बारे में पता करने और उन्हें समाज से अलग (isolate) करने में सक्षम हो। ये तो हो गयी व्यवस्था की बात, कुछ और बातों का भी ध्यान रखना चाहिये - (i) जो लोग पहले से किसी अन्य बीमारी से बीमार हैं उनका लगातार ध्यान रखने की व्यवस्था करना, (ii) लोगों तक रोजमर्रा की चीजों की व्यवस्था करना और वित्तीय सहायता पहुँचाना, और (iii) फिर से लॉक-डाउन के लिए तैयार रहना यदि संक्रमण तेजी से बढ़ना शुरू हो। 

एक बड़ी चर्चा कितने टेस्ट किये जा रहे हैं उस पर चल रही है। किसको टेस्ट करना है और कब करना है ये महामारी के अलग-२ चरण पर भी निर्भर करता है। अब यदि संक्रमित लोगों की संख्या नगण्य है तो ऐसे लोगों को आम जनता से अलग रखने, उनके संपर्क में आये लोगों के बारे में पता करने और उनपर ध्यान रखना प्रमुख रणनीति होनी चाहिये। पर यदि संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है तो इसके उद्गम स्थानों को चिन्हित करें और triage (आपातकाल में कार्यवाही की प्राथमिकता का निर्धारण ) के माध्यम से ये सुनिश्चित करने का प्रयास करें कि किसे टेस्ट और उपचार की आवश्यकता है और किसे अभी घरों में या आइसोलेशन केंद्रों में रखा जा सकता है। कई देशों में टेस्ट किट की कमी होने के कारण triage करना अति-आवश्यक हो जाता है। कई देशों में जिन संदिग्ध व्यक्तियों में बीमारी के लक्षण नहीं होते उन्हें टेस्ट भी नहीं करते और ये वैज्ञानिक रूप से सिद्ध प्रक्रिया है। जब महामारी का असर कम होने लगता है तब भी नए और पुराने केसेस को टेस्ट करना और भी आवश्यक हो जाता है। इससे बीमारी को फिर से फैलने से रोकने में मदद मिलती है। पर सबसे जरूरी यह है की टेस्ट और उपचार की लड़ाई अगले कुछ महीने में नहीं ख़त्म होने वाली, जब तक की एक वैक्सीन तैयार न हो जाये और उपचार का एक प्रोटोकॉल न बन जाय। इसलिये जहाँ कहीं भी नए संक्रमण की सूचना मिले वहाँ टेस्ट की संख्या बढ़ानी पड़ेगी। 

ये पोस्ट लम्बा हो रहा है पर एक आखिरी बात कहना आवश्यक है - इस बीमारी का अभी तक कोई ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल नहीं है और इस वायरस का कोई वैक्सीन नहीं। अधिकतर शोध और परीक्षण अभी लैब में ही चल रहे हैं और उनका अभी मनुष्यों पर प्रभाव सुनिश्चित होना शेष है। और इसलिये हमें बचाव के जितने भी रूप हो सकते हैं उन्हें अपनाना चाहिये। 

और ये आप समझ लीजिये कि सामान्य समय में आपको अपने अधिकारों को संरक्षित करने की पूरी छूट है और करना भी चाहिये, पर महामारी और विपदा के समय सामूहिक (समुदाय के) अधिकार अधिक महत्वपूर्ण बन जाते हैं और आपके व्यक्तिगत अधिकार केवल तब तक मान्य हैं जब तक वे सामूहिक अधिकारों में बाधा नहीं डालते। आपके अधिकार निर्वात में नहीं होते, कर्तव्यों से उनका सामंजस्य होना पड़ता है। विपदा की स्थिति में यदि आप अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे तो सरकार का दायित्व बनता है कि वो आपको बल पूर्वक आपके कर्तव्य याद दिलाये। अगर ऐसा नहीं करती है तो सरकार अपने कर्तव्य से पीछे हट रही है!

सुरक्षित रहिये - दूरी बनाये रखिये।

SARS-CoV-2 या CORONA Virus या COVID-19 - आईए समझें और जानें

Originally published: https://rahulpandeygkp.blogspot.com/2020/03/sars-cov-2-corona-virus-covid-19.html

आज चारो तरफ CORONA की ही चर्चा है। सोशल मीडिया के जमाने में हर बात विकराल रूप से फैलती है, चाहे वो सही ज्ञान हो या गलत ज्ञान। अब जब चारो तरफ से ज्ञान की वर्षा हो रही हो तो मष्तिष्क काम नहीं करता है और सही गलत में निर्णय करना बंद कर देता है। तो चलिये सरल भाषा में CORONA के बारे में बात करते हैं और समझते हैं कि ये क्या है और क्या कर सकता है और हमें क्या करना चाहिये। मैं "वायरस क्या है?" इसके बारे में चर्चा नहीं करूँगा, आप इसके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। 

Corona Virus (कोरोना विषाणु) विषाणुओं का एक ऐसा समूह है जो स्तनधारियों में बीमारी फ़ैलाने का काम करता है। यह वायरस अधिकतर श्वांस से सम्बंधित बिमारियों को पैदा करता है। यदि आपका इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) सही है तो वह वायरस से लड़ाई लड़ता है और ज्यादातर संक्रमित व्यक्ति ठीक भी हो जाते हैं। पर कुछ संक्रमित व्यक्ति इस वायरस से लड़ नहीं पाते और उनकी मृत्यु हो जाती है। इस वायरस को ६० के दशक में पहली बार पाया गया था। तबसे इसके कई भाई-भतीजे विश्व भर में अपने कोहराम मचा चुके हैं, उनमे प्रमुख हैं -  SARS-CoV, HCoV NL63, HKU1, MERS-CoV इत्यादि। पर अभी जो वायरस विश्व भर में तहलका मचा रहा है उसका नाम है Severe Acute Respiratory Syndrome CoronaVirus 2 (SARS-CoV-2। इस वायरस का शुरू में नाम 2019 Novel CoronaVirus (2019-nCoV) रखा गया था। Novel वायरस उसे कहते हैं, जिसके बारे में दुनिया को कुछ पता नहीं होता और उसके बारे में कुछ भी अनुमान लगाना कठिन होता है। 2019-nCoV वायरस Corona परिवार का सबसे नया सदस्य है जिसने तबाही मचा रखी है और यही COVID19 बीमारी का कारण है। यहाँ आपको Corona वायरस और इसके द्वारा होने वाली बीमारी COVID-19 के बीच अंतर पता चल गया होगा। 

इस वायरस की शुरुआत वुहान, जो कि चीन का एक प्रमुख शहर है, से नवम्बर-दिसंबर २०१९ में हुई और आज ये १६६ देशों में करीब २.८५ लाख लोगों को संक्रमित कर चुका है। इसमें से करीब १२,००० लोगों की मृत्यु हो चुकी है और करीब ९४,००० लोग ठीक हो चुके हैं। चूँकि यह वायरस एकदम नया है, इस पर अलग-२ देशों में कई सारे शोध हो रहे हैं और इस वायरस का व्यवहार कैसा रहेगा? किसी सतह पर कितने समय तक सक्रिय रहेगा? आदि पर बहुत अधिक ज्ञान नहीं है। पर अभी तक के संक्रमण के अध्ययन से ये पता चलता है कि इस वायरस के फैलने के २ ही तरीके हैं: (१) संक्रमित व्यक्ति के १ मीटर की दायरे में आने पर उसके खांसी और छींकने पर कुछ कण आपके ऊपर गिर सकते हैं, और (२) वायरस से दूषित किसी सतह के संपर्क में आने पर। अभी तक यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि यह वायरस मनुष्यों से जानवरों में या जानवरों से मनुष्यों में फ़ैल सकता है। यह वायरस मनुष्यों में कैसे आया, इसपर अभी शोधकर्ताओं में कई मतभेद हैं। एक शोध के द्वारा ये पता चला है कि यह वायरस अलग-२ सतहों पर ४ घंटे से लेकर ७२ घंटों तक सक्रिय रह सकता है (अधिक जानकारी के लिये यहाँ पढ़ें)। 

इस वायरस की एक सबसे खास बात यह है कि आप इससे संक्रमित हो सकते हैं और इसके बाद भी कई दिनों तक COVID-19 के लक्षण नहीं दिखाई दें (इसे इन्क्यूबेशन पीरियड कहते हैं) - यह इस वायरस को सबसे खतरनाक बनाता है। क्यूंकि जब तक लक्षण नहीं आते तब तक आप इलाज के लिये जाएंगे नहीं और हो सकता है तब तक कई लोग आप से संक्रमित हो चुके हों (वैसे इस बात पर अभी सहमति नहीं बनी है कि इन्क्यूबेशन पीरियड में संक्रमण कितने हद तक फैल सकता है)। कोई भी वायरस कितनी तेजी से फैलेगा उसे "R0" फैक्टर या "बेसिक रिप्रोडक्शन रेश्यो" से मापा जाता है। "R0" से यह पता चलता है कि किसी भी निर्धारित जनसँख्या में कोई भी संक्रमित व्यक्ति और कितने लोगों को संक्रमित कर सकता है जहाँ सारे लोग उस वायरस से संक्रमित हो सकते हों। SARS-CoV-2 के लिए "R0" २ से ३ के बीच में माना जाता है जो कि अपने आप में बहुत अधिक है और शायद इसीलिए एक समय के बाद संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में कई गुना की वृद्धि होती है। 

कुछ और बातें समझते हैं। अभी तक की जानकारी के हिसाब से २० साल से कम उम्र के लोग इससे सबसे कम संक्रमित होते हैं और ६० साल से ऊपर के लोग सबसे ज्यादा। केवल करीब १४% मरीज गंभीर रूप से और करीब ५% अति-गंभीर रूप से बीमार होते हैं; इसका अर्थ यह है कि करीब ८०% प्रतिशत लोगों में संक्रमण का असर हल्का रहता है। अति गंभीर बिमारियों में निमोनिया और शरीर के कई अंगो का एक साथ काम करना बंद हो जाना प्रमुख हैं और इसके कारण कई बार मरीज की मृत्यु भी हो जाती है। अलग-२ शोधों के अनुसार करीब COVID-19 की मृत्यु दर २% से ४% के बीच में मानी गयी है। लेकिन अधिक उम्र के व्यक्तियों में ये करीब १५% तक भी पायी गयी है। COVID-19 के प्रमुख लक्षणों में है - खांसी, बुखार, साँस फूलना हैं। कुछ मरीजों में शरीर दर्द, कफ और गले में खराश भी पाए जाते हैं। जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा है, यह वायरस नया है और इसके नए-२ लक्षण भी नज़र आ रहे हैं - कुछ नए लक्षणों में है - उलटी-दस्त और सूंघने की क्षमता ख़त्म होना। 

तो बचना कैसे है? जैसा हमने ऊपर चर्चा की कि "R0" फैक्टर अधिक होने के कारण यदि संक्रमण को रोका नहीं गया तो लाखों लोग संक्रमित होंगे और इनमे से जबकि केवल ४-५% लोगों को सघन चिकित्सा की आवश्यकता होगी, किसी भी देश में जनसँख्या के अनुसार इतनी संख्या में मरीजों के लिए सघन चिकित्सा की व्यवस्था नहीं होती (इसके बारे में कभी और लिखूंगा)। इसलिए हमें जन-स्वास्थ्य की सिद्धांतों पर भी काम करने की आवश्यकता होगी। हमने पढ़ा कि वायरस कैसे फैलता है, अब देखें कि उससे कैसे बच सकते हैं:

(१) संक्रमित व्यक्ति के १ मीटर की दायरे में आने पर उसके खांसी और छींकने पर कुछ कण आपके ऊपर गिर सकते हैं: ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि संक्रमित लोगों की पहचान करने और उनकी जाँच करने के सही प्रोटोकॉल और व्यवस्था हो। जो लोग संक्रमित हैं उन्हें आइसोलेशन में (आम जनता से अलग) रखा जाय जब तक उनका संक्रमण समाप्त न हो जाये। यह भी आवश्यक है कि ऐसे लोग और इनकी सेवा करने वाले लोग मास्क पहने और संक्रमण आगे फैलने से रोकें। अब जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा कि बहुत सारे लोग बिना किसी लक्षण के भी कई दिनों तक संक्रमित रह सकते हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि जिन लोगों में इस वायरस से संक्रमित होने की सम्भावना ज्यादा है (जैसे संक्रमित देशों से आने वाले लोग) वो स्वयं को सबसे अलग रखें और "सोशल डिस्टन्सिंग" का पालन करें। 

(२) वायरस से दूषित किसी सतह के संपर्क में आने पर: यह पाया गया है कि साबुन और अल्कोहल आधारित sanitizer से यह वायरस निष्क्रिय हो जाता है। इसलिये यह आवश्यक है कि यदि आपने किसी ऐसी सतह को छुआ है तो तुरंत अपना हाथ साबुन से धोयें या sanitizer से साफ़ करें - इसे हाथ की स्वच्छता या hand hygiene कहते हैं। ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम एक दिन में करीब २,०००-३,००० बार अपने चेहरे के अलग-२ हिस्सों को छूते हैं। चूँकि हमें यह नहीं पता कि जिस सतह को हमने छुआ वो संक्रमित था या नहीं, इसलिए यह सलाह दी जाती है कि दिन में करीब १०-१२ बार साबुन या sanitizer से अपने हाथ धोयें। 

अब जबकि COVID-19 ने महामारी का रूप ले लिया है तो केवल जन-स्वास्थ्य के प्रयासों से इसका हल नहीं निकलने वाला है। पर सघन-चिकित्सा की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण हमें दोनों तरह के प्रयास करते रहना है। ऊपर लिखे तरीकों से हम इस संक्रमण की लगातार बढ़ती श्रृंखला को तोड़ सकते हैं, जब तक शृंखला नहीं टूटेगी, तब तक शायद इसकी संख्या में लगातार वृद्धि होती रहे। 

आइये ये प्रण करें कि हम हाथ की स्वच्छता बनाये रखेंगे। हम अगर संक्रमित देशों से आये हैं तो स्वयं को सबसे अलग रखेंगे। अगर हममे बीमारी के लक्षण हैं तो मास्क लगाएंगे और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करेंगे। 

यदि हम चाहेंगे तो COVID-19 को हरा सकते हैं। 

(इस पोस्ट  में दी गयी सभी जानकारी और तथ्य सार्वजानिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से और मेरे स्वयं के अनुभव पर आधारित है। यह पोस्ट किसी शोध के लिए नहीं, केवल सामन्य लोगों की जानकारी बढ़ाने के लिए लिखा गया है। अगर आपमें संक्रमण के लक्षण दिखाई देते हैं तो आप तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें)